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Bihar MLC Election: 9 सीटों के चुनाव ने बढ़ाई सियासी गर्मी, NDA और RJD में रणनीति तेज

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बिहार विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव की घोषणा के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। जेडीयू, आरजेडी और एनडीए में उम्मीदवारों के नामों को लेकर मंथन तेज हो गया है।

पटना/आलम की खबर:बिहार विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव की घोषणा होते ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक सभी राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा तारीखों की घोषणा के बाद अब राजनीतिक गलियारों में बैठकों और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इन सीटों पर चुनाव विधायक कोटे से होना है और मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। ऐसे में सभी दल अपने समीकरण साधने में लगे हुए हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू में संभावित उम्मीदवारों को लेकर हो रही है। पार्टी के भीतर कई नाम तेजी से सामने आ रहे हैं। इनमें निशांत कुमार, ललन मंडल और राजीव कुमार सिंह के नाम प्रमुख रूप से चर्चा में बताए जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार जेडीयू सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि पार्टी अलग-अलग वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार कर रही है।

सूत्रों के अनुसार सहनी समाज से भी किसी चेहरे को मौका दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में बीजेपी नेता भीष्म साहनी समेत अन्य सहनी नेताओं के नामों पर भी चर्चा चल रही है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं और विधान परिषद चुनाव में भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है।

जेडीयू के अंदर सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा हो रही है, वह निशांत कुमार का है। हाल ही में उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली है, लेकिन फिलहाल वे न तो विधान सभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह लगभग तय माना जा रहा है कि उन्हें परिषद चुनाव में मौका मिल सकता है। पार्टी के भीतर भी इस संभावना को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

उधर राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी भी चुनाव को लेकर सक्रिय हो गई है। पार्टी अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर लगातार मंथन कर रही है। बताया जा रहा है कि आरजेडी इस चुनाव में कम से कम एक सीट पर मजबूत दावा पेश करने की तैयारी में है। पार्टी नेतृत्व इस बार उम्मीदवार चयन में काफी सावधानी बरतना चाहता है ताकि राजनीतिक संदेश भी मजबूत जाए और संगठनात्मक संतुलन भी बना रहे।

सूत्रों के अनुसार नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव खुद उम्मीदवारों के नामों पर अंतिम फैसला कर सकते हैं। फिलहाल वे दिल्ली में मौजूद हैं और अगले कुछ दिनों में पटना लौटने की संभावना है। वहीं आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव भी इलाज के सिलसिले में विदेश जाने वाले हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर चुनावी रणनीति को लेकर लगातार बैठकों का दौर जारी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनता के वोट से नहीं होता हो, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व काफी बड़ा होता है। यह चुनाव आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी राजनीतिक संकेत देने का काम करता है। इसलिए सभी दल इस चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं।

इधर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी इस चुनाव को लेकर अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए से अपनी पार्टी के लिए एक सीट की मांग की है। मांझी ने साफ कहा है कि उनकी पार्टी पहले भी यह मांग उठाती रही है और अब भी वह इसी पर कायम हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनकी पार्टी को विधान परिषद में प्रतिनिधित्व मिलता है तो इससे गठबंधन और अधिक मजबूत होगा।

मांझी के इस बयान के बाद एनडीए के भीतर सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि छोटे दलों को साथ बनाए रखने के लिए एनडीए नेतृत्व को संतुलन बनाकर चलना होगा। मांझी ने यह भी संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे पर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से बातचीत कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हमेशा एनडीए के साथ मजबूती से खड़ी रही है और भविष्य में भी गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहेगी।

इस चुनाव में जिन सीटों पर नए सदस्यों का चयन होना है, उनमें कई बड़े नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इनमें जेडीयू की कुमुद वर्मा और प्रोफेसर गुलाम गौस, आरजेडी के मोहम्मद फारूख और बीजेपी के भीष्म साहनी जैसे नाम शामिल हैं। इसके अलावा बीजेपी के संजय प्रकाश उर्फ संजय मयूख, कांग्रेस के समीर कुमार सिंह और आरजेडी के सुनील कुमार सिंह का कार्यकाल भी समाप्त होने जा रहा है।

राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि कुछ सीटें इस्तीफों के कारण भी खाली हुई हैं। जेडीयू से मंत्री बने भगवान सिंह कुशवाहा पहले ही विधान परिषद की सदस्यता छोड़ चुके हैं। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर भी चुनाव होना है। ऐसे में कुल मिलाकर यह चुनाव सभी दलों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव को हमेशा शक्ति संतुलन के नजरिए से देखा जाता है। इस चुनाव के जरिए राजनीतिक दल अपने संगठन के महत्वपूर्ण नेताओं, सामाजिक समूहों और सहयोगी दलों को साधने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि उम्मीदवारों के नामों को लेकर इतनी चर्चा हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का चुनाव कई राजनीतिक संदेश भी देगा। एक तरफ एनडीए अपने सहयोगियों को संतुष्ट रखने की चुनौती से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर आरजेडी विपक्षी एकजुटता और संगठनात्मक मजबूती दिखाने की कोशिश में है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे उम्मीदवारों के नाम सामने आएंगे, बिहार की राजनीति और गर्म होने की संभावना है।

फिलहाल सभी दलों की नजर उम्मीदवारों की घोषणा और सीटों के अंतिम समीकरण पर टिकी हुई है। राजनीतिक गलियारों में लगातार बैठकों और चर्चाओं का दौर जारी है। अब देखना होगा कि कौन-सी पार्टी किस चेहरे पर दांव लगाती है और यह चुनाव बिहार की राजनीति को किस नई दिशा में ले जाता है।

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